" कुछ छूट रहा है क्या ?" शशि ने पूछा
" हाँ " मैंने एक लम्बी सांस ली " ढेर सारी यादें ... "
"बस यादें ?" उसने मेरी बात बीच में ही काट अपना तीखा सवाल दाग दिया |
शायद नहीं, सिर्फ यादें नहीं छोड़ कर जाऊँगा मैं यहाँ से | कोई और भी यहीं छूट रहा है, मगर ये सिर्फ मेरा वहम भी हो सकता है | हाँ, ये मेरा वहम ही है |
" हाँ , बस यादें | तू कार लायी है न अपनी, ये बैग और सूटकेस फटाफट पीछे डाल दे. तेरी बातों के चक्कर में लेट हो जायेंगे " मैं जल्दी से बोला |
"मिस्टर बहानेबाज |" शशि पे कोई असर नहीं हुआ "ट्रेन अभी तक स्टेशन पहुची भी नहीं होगी और वैसे भी हम सिर्फ ३ किलोमीटर दूर हैं | अ डिस्टेंस ऑफ़ ओनली ३ किलोमीटर | तू भी जानता हैं मैं नैना की बात कर रही हूँ. "
"तू जानती है की हमारे बीच जो भी था वो...... "
"मगर तेरा चेहरा तेरी उस बात को सप्पोर्ट नहीं करता | या तो तू झूठ बोल रहा है या फिर तेरा चेहरा |"
अपने चेहरे के भाव छुपाना मुझे कभी नहीं आया | शशि का कहना सही था | मैं नैना को मिस कर रहा था हालाँकि ऐसा होना नहीं चाहिए था | इसकी कोई वजह भी नहीं थी |
हमारा रिश्ता शुरू से आखिर तक स्वार्थ पे ही टिका रहा था | उसमे कहीं भावनाओ के आने की गुंजाईश न तो मैंने रखी थी न ही उसने |
मुझे याद है वो दिन जब मैंने उसे पहली बार कॉलेज कैम्पस में देखा था | मैं तब सेकंड इअर में आ चुका था और सीनेएर बन चुका था | कॉलेज में रेग्गिंग की सख्त मनाही थी मगर तब भी लड़के लड़कियां कहीं न कहीं जुनिएर्स को घेर ही लेते | मेरे दोस्त भी इसी कोशिश में थे और उनसे जो लड़की टकराई वो नैना थी | मैं हालाँकि रेग्गिंग में शामिल नहीं होता था मगर कभी कभी वहां खड़े होकर मज़े जरुर लूट लेता था | नैना ने पहली बार में मेरा ध्यान खीच लिया था | इसका कारण था एक अदद आत्मविश्वास, a certain assertiveness | वो उसका कॉलेज का पहला दिन था मगर वो जरा भी घबराई न थी | मुझे पहली बार में वो बेहद खुबसूरत तो नहीं लगी लेकिन मैं उसकी ओर आकर्षित जरुर हुआ | मेरे दोस्तों ने उसकी रेग्गिंग लेने की नाकाम कोशिश की | उस नाकाम कोशिश के बाद उन्हें प्रिंसिपल से डांट और झेलनी पड़ी क्योंकि नैना ने उनकी शिकायत कर दी थी | आते ही वो कॉलेज में छा गई थी |
" लास्ट एसेमेस ६ दिन पहले का है | पिछले ४ दिनों में कोई कॉल भी नहीं है | मतलब उस तरफ से कुछ भी नहीं है |" शशि मेरा फ़ोन उलटते पुलटते बोली |
"इधर से भी कुछ नहीं है" मैं झल्लाते हुए बोला " मेरा फ़ोन छेड़ना बंद कर | उसमे कुछ नहीं है |"
" तुने लास्ट सेमेस्टर के नोट्स दे दिए क्या उसे ?| शशि ने फ़ोन थमाते हुए पूछा |
"हाँ | ५ दिन पहले दे चुका हूँ, उसके पेपर ख़तम होते ही | "
नोट्स, बुक्स, टेस्ट पेपर्स - यही बड़ी वजह से उसकी मेरे पास आने की | उस रेग्गिंग हादसे के बाद सीनीयर्स ने फैसला कर लिया था की नैना की किसी भी तरह की कोई मदद नहीं की जाएगी | नैना ने पहले साल तो इस बात के टेंशन नहीं ली मगर दुसरे साल में जब उसकी अपनी ब्रांच की क्लास शुरू की तब उसे एहसास हुआ की सीनीयर्स की मदद के बिना उसे आगे बहुत दिक्कत होने वाली है , मगर तब तक समझौते की उम्मीदें भी ख़तम हो चुकी थी |
" तू उसकी पिक्चर में आया कब ?" शशि ने पूछा
" तीसरे साल, जब अपनी ब्रांच के ज्यादातर सीनीयर्स ने उसकी मदद से इंकार कर दिया. "
"हम्म .... उन्ही दिनों तू एक गर्लफ्रेंड के लिए बड़ा उतावला हो रहा था | मुझे अच्छी तरह याद है | तो इस तरह से हुई तुम लोगो की सेटिंग | "
जब नैना ने ये ऑफर मेरे सामने रखा था तो मैं हक्का बक्का रह गया था | वो कुछ शर्तो के साथ मेरी गर्लफ्रेंड बनने को तैयार थी अगर मैं बदले में उसे सब नोट्स और किताबें देता रहता इंजीनियरिंग के आखिर तक.|
"तुम पागल हो क्या ? ये क्या डील हुई ? ये तो खुदगर्जी की इन्तहा है |"
" इसमें गलत क्या है? आपको पता है की बिना सीनीयर्स की मदद के मुझे बहुत मुश्किल होने वाली है और यहाँ मैंने सब से ही पंगा ले रखा है | मुझे पता है की आपको डर है की अगर आपने मेरी मदद की तो आपके ही दोस्त आपके खिलाफ हो जायेंगे | इसके लिए बेहतर है की आप मुझे अपनी गर्लफ्रेंड बना लीजिये | इसमें आपका भी फायदा है और मेरा भी , साथ ही मेरी मदद करने पर आप पर कोई उंगली भी नहीं उठाएगा |"
"मतलब तुम ओके हो इस बात से | लोग मुझे तुम्हारा बोय्फ्रेंड कहेंगे और तुमे कोई फर्क नहीं पड़ेगा ... मतलब मैं तुम्हारा सीनीएर हूँ और....... |"
" आपके कई दोस्तों की जी एफ्स मेरी क्लास मेटस हैं | आप कोई अपराध नहीं करोगे ऐसा करके | ये गिव एंड टेक का जमाना है | आपको कॉलेज में दिखने को गर्लफ्रेंड मिल रही है और मुझे आपकी हेल्प | इसमें क्या बुराई है?"
आखिर मैं उसकी बात मान गया | दुनिया को दिखाने को आज मेरे पास भी एक गर्लफ्रेंड थी | सोचने में आज भले ही ये बचकानी बात लगे मगर तब मैं इस बात से काफी खुश हुआ था | कॉलेज की ज़िन्दगी आखिर होती ही कुछ इस तरह की है |
" मेरे ख्याल से हमें अब रवाना होना चाहिए |" शशि मुझे यादों के भंवर से बाहर खीच लायी | मैंने पीछे पलट कर अपने हॉस्टल की ईमारत को आखिरी बार देखा | इसी जगह अपने घर से मीलो दूर मैंने एक घर पाया था | इस जगह और अपने कॉलेज से मेरी सेकड़ो यादें जुडी हुई हैं | ४ साल का अरसा यूँ देखो तो कम है और यूँ देखो तो उसमे हजारो दिन और लाखों पल है | एक याद बनाने को तो चंद लम्हे ही काफी होते हैं |








