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Thursday, December 17, 2009

गुंजाईश - 1

" कुछ छूट रहा है क्या ?" शशि ने पूछा
" हाँ " मैंने एक लम्बी सांस ली " ढेर सारी यादें ... "
"बस यादें ?" उसने मेरी बात बीच में ही काट अपना तीखा सवाल दाग दिया |

शायद नहीं, सिर्फ यादें नहीं छोड़ कर जाऊँगा मैं यहाँ से | कोई और भी यहीं छूट रहा है, मगर ये सिर्फ मेरा वहम भी हो सकता है | हाँ, ये मेरा वहम ही है |

" हाँ , बस यादें | तू कार लायी है न अपनी, ये बैग और सूटकेस फटाफट पीछे डाल दे. तेरी बातों के चक्कर में लेट हो जायेंगे  " मैं जल्दी से बोला |

"मिस्टर बहानेबाज |" शशि पे कोई असर नहीं हुआ "ट्रेन अभी तक स्टेशन पहुची भी नहीं होगी और वैसे भी हम सिर्फ ३ किलोमीटर दूर हैं | अ डिस्टेंस ऑफ़ ओनली ३ किलोमीटर | तू भी जानता हैं मैं नैना की बात कर रही हूँ. "

"तू जानती है की हमारे बीच जो भी था वो...... "

"मगर तेरा चेहरा तेरी उस बात को सप्पोर्ट नहीं करता | या तो तू झूठ बोल रहा है या फिर तेरा चेहरा |"

अपने चेहरे के भाव छुपाना मुझे कभी नहीं आया | शशि का कहना सही था | मैं नैना को मिस कर रहा था हालाँकि ऐसा होना नहीं चाहिए था | इसकी कोई वजह भी नहीं थी |


हमारा रिश्ता शुरू से आखिर तक स्वार्थ पे ही टिका रहा था | उसमे कहीं भावनाओ के आने की गुंजाईश न तो मैंने रखी थी न ही उसने |


मुझे याद है वो दिन जब मैंने उसे पहली बार कॉलेज कैम्पस  में देखा था | मैं तब सेकंड इअर में आ चुका था और सीनेएर  बन चुका था | कॉलेज में रेग्गिंग की सख्त मनाही थी मगर तब भी लड़के लड़कियां कहीं न कहीं जुनिएर्स को घेर ही लेते | मेरे दोस्त भी इसी कोशिश में थे और उनसे जो लड़की टकराई वो नैना थी | मैं हालाँकि रेग्गिंग में शामिल नहीं होता था मगर कभी कभी वहां खड़े होकर मज़े जरुर लूट लेता था | नैना ने पहली बार में मेरा ध्यान खीच लिया था | इसका कारण था एक अदद आत्मविश्वास,  a certain assertiveness | वो उसका कॉलेज का पहला दिन था मगर वो जरा भी घबराई न थी | मुझे पहली बार में वो बेहद खुबसूरत तो नहीं लगी लेकिन मैं उसकी ओर आकर्षित जरुर हुआ | मेरे दोस्तों ने उसकी रेग्गिंग लेने की नाकाम कोशिश की | उस नाकाम कोशिश के बाद उन्हें प्रिंसिपल से डांट और झेलनी पड़ी क्योंकि  नैना ने उनकी शिकायत कर दी थी | आते ही वो कॉलेज में छा  गई थी |

" लास्ट एसेमेस ६ दिन पहले का है | पिछले ४ दिनों में कोई कॉल भी नहीं है | मतलब उस तरफ से कुछ भी नहीं है |" शशि मेरा फ़ोन उलटते पुलटते बोली |

"इधर से भी कुछ नहीं है" मैं झल्लाते हुए बोला " मेरा फ़ोन छेड़ना बंद कर | उसमे कुछ नहीं है |"

" तुने लास्ट सेमेस्टर के नोट्स दे दिए क्या उसे ?| शशि ने फ़ोन थमाते हुए पूछा |

"हाँ | ५ दिन पहले दे चुका हूँ, उसके पेपर ख़तम होते ही | "

नोट्स, बुक्स, टेस्ट पेपर्स - यही बड़ी वजह से उसकी मेरे पास आने की | उस रेग्गिंग हादसे के बाद सीनीयर्स ने फैसला कर लिया था की नैना की किसी भी तरह की कोई मदद नहीं की जाएगी | नैना ने पहले साल तो इस बात के टेंशन नहीं ली मगर दुसरे साल में जब उसकी अपनी ब्रांच की क्लास शुरू की तब उसे एहसास हुआ की सीनीयर्स की मदद के बिना उसे आगे बहुत दिक्कत होने वाली है , मगर तब तक समझौते की उम्मीदें भी ख़तम हो चुकी थी |

" तू उसकी पिक्चर में आया कब ?" शशि ने पूछा

" तीसरे साल, जब अपनी ब्रांच के ज्यादातर सीनीयर्स ने उसकी मदद से इंकार कर दिया. "

"हम्म .... उन्ही दिनों तू एक गर्लफ्रेंड के लिए बड़ा उतावला हो रहा था | मुझे अच्छी तरह याद है | तो इस तरह से हुई तुम लोगो की सेटिंग | "

जब नैना ने ये ऑफर मेरे सामने रखा था तो मैं  हक्का बक्का रह गया था | वो कुछ शर्तो के साथ मेरी गर्लफ्रेंड  बनने  को तैयार थी अगर मैं बदले में उसे सब नोट्स और किताबें देता रहता इंजीनियरिंग के आखिर तक.|


"तुम पागल हो क्या ? ये क्या डील हुई ? ये तो खुदगर्जी की इन्तहा है |"


" इसमें गलत क्या है? आपको पता है की बिना सीनीयर्स की मदद के मुझे बहुत मुश्किल होने वाली है और यहाँ मैंने सब से ही पंगा ले रखा है | मुझे पता है की आपको डर है की अगर आपने मेरी मदद की तो आपके ही दोस्त आपके खिलाफ हो जायेंगे | इसके लिए बेहतर है की आप मुझे अपनी गर्लफ्रेंड बना लीजिये | इसमें आपका भी फायदा है और मेरा भी , साथ ही मेरी मदद करने पर आप पर कोई उंगली भी नहीं उठाएगा |"


"मतलब तुम ओके हो इस बात से | लोग मुझे तुम्हारा बोय्फ्रेंड कहेंगे और तुमे कोई फर्क नहीं पड़ेगा ... मतलब मैं तुम्हारा सीनीएर हूँ और....... |"


" आपके कई दोस्तों की जी एफ्स  मेरी क्लास मेटस हैं | आप कोई अपराध नहीं करोगे ऐसा करके | ये गिव एंड टेक का जमाना है | आपको कॉलेज में दिखने को गर्लफ्रेंड मिल रही है और मुझे आपकी हेल्प | इसमें क्या बुराई है?"


आखिर मैं उसकी बात मान गया | दुनिया को दिखाने  को आज मेरे पास भी एक गर्लफ्रेंड थी | सोचने में आज भले ही ये बचकानी बात लगे मगर तब मैं इस बात से काफी खुश हुआ था | कॉलेज की ज़िन्दगी आखिर होती ही कुछ इस तरह की है |

" मेरे ख्याल से हमें अब रवाना होना चाहिए |" शशि मुझे यादों के भंवर से बाहर खीच लायी | मैंने पीछे पलट कर अपने हॉस्टल की ईमारत को आखिरी बार देखा | इसी जगह अपने घर से मीलो दूर मैंने एक घर पाया था | इस जगह और अपने कॉलेज से मेरी सेकड़ो यादें जुडी हुई हैं | ४ साल का अरसा यूँ देखो तो कम  है और यूँ देखो तो उसमे हजारो दिन और लाखों पल है | एक याद बनाने को तो चंद लम्हे ही काफी होते हैं |

Tuesday, November 24, 2009

इस सच को मगर ...........













हर सहर खुद से तुझे भूल जाने का वादा किया करता हूँ
मगर दिल ही दिल में तो तेरे लौट आने की दुआ किया करता हूँ
यूँ तो छोड़ गयी तेरी कश्ती मेरा साहिल कब का
हवाओं से मैं फिर भी उसे मोड़ लाने की उम्मीद किया करता हूँ

तेरा साया बन मंजिल तक साथ चलने की ख्वाहिश थी मेरी
वक़्त की लहरों से बस इतनी सी ही गुजारिश थी मेरी
आज मगर जब जुदा हो गए हैं हमारे रास्ते इस तरह
तेरे अक्स को दिल में बसाये मैं दिन रात सफ़र किया करता हूँ

वो हसीं लम्हे आज भी मेरी यादों में छाये हैं
तेरी एक झलक को अब भी तलाशती  मेरी ये निगाहें हैं
दरिया बन तुम तो कब की बह कर जा चुकी हो
मैं तो तालाब का पानी बन फिर भी तेरा इंतज़ार किया करता हूँ

आखिर क्यूँ यूँ बसंत के बाद पतझड़ का आना होता है
क्यूँ अचानक ख्वाबो का टूट कर बिखर जाना होता है
जानता हूँ ये की हर हसरत हकीकत नहीं बन पाती
इस सच को मगर रोज़ झुठलाने की कोशिश किया करता हूँ ...

Monday, November 16, 2009

मेरे माता पिता को समर्पित एक कविता













बचपन में वो चलना मेरा
लडखडाना और गिरना मेरा
आपका कर देना मेरे आंसुओं को किनारे
और फिर मुस्कुराना मेरा

याद हैं वो किस्से आज भी
जो आपने मुझे सुनाये थे
मेरी नींद की खातिर जब
आप भी सो नहीं पाए थे

मेरी राह के बेशुमार कांटे
सब आपने ही तो चुने थे
ख्वाबो के ये खूबसूरत घरोंदे
आपने ही तो बुने थे

मुश्किलों की कड़ी धुप ने
जब भी मुझे डराया था
आपने ही तो दरख़्त  बनकर 
मुझे अपने साए में छुपाया था

कभी कभी कहता है दिल
फिर बीते लम्हों में लौट जाऊ
नन्हा सा वही बच्चा बन
आपकी बाँहों में सिमट जाऊ

Friday, November 13, 2009

ये भंवर तुम्हारी मंजिल नहीं














कब तक यूँ खामोशी का लिबास ओढे रहोगी
बस सुनोगी मुझे तुम, क्या खुद कुछ न कहोगी?

टूटती हैं उम्मीदें जब, दिल में गहरा  घाव छोड़  जाती हैं
वक़्त का मरहम लगने दो अब, कब तक इस दर्द को सहोगी?

जिन्दगी एक चंचल नदिया है और  यादें एक ठहराव
ये भंवर  तुम्हारी  मंजिल  नहीं, फिर क्यूँ इस पड़ाव पे रुकोगी?

रिश्ते बेर के फल की तरह है, कभी मीठे तो कभी खट्टे
एक कड़वे अनुभव को याद कर, दोस्त बनाने से कब तक डरोगी?

ग़म के चाँद लम्हों के लिए, अपने आंसुओं को यूँ जाया न करो 
खुशियों के कई लम्हे अभी बाकी हैं, तब क्या रोते हुए न हंसोगी? 

Wednesday, November 11, 2009

धुंधला नहीं है वजूद मेरा













एक अनजान पहेली नहीं मैं जिसे तुम जान न सको
धुंधला नहीं है वजूद मेरा कि तुम मुझे पहचान न सको

करवटें बदलती रहती हैं लहरें तो क्या मगर
गुम  नहीं होते साहिल यूँ की तुम उन्हें तलाश ना सको

इन हवाओं में यहाँ नहीं है असर अभी इतना कि
रेत पर मेरे कदमो के निशान तुम पा न सको

जिंदगी की दौड़ में कहीं आगे निकल गया हूँ मैं
इतना पराया तो नहीं की आवाज़ दे मुझे बुला न सको

एक पल के लिए ही, कभी मेरा अक्स जेहन में ले आना
ये कोई ऐसा वादा तो नहीं जिसे तुम निभा न सको

कभी याद बन तुम्हारी आँखों में उमड़ भी आऊं तो
इतना अजीज भी नहीं की पलकों में तुम मुझे छुपा न सको