हर सहर खुद से तुझे भूल जाने का वादा किया करता हूँ
मगर दिल ही दिल में तो तेरे लौट आने की दुआ किया करता हूँ
यूँ तो छोड़ गयी तेरी कश्ती मेरा साहिल कब का
हवाओं से मैं फिर भी उसे मोड़ लाने की उम्मीद किया करता हूँ
तेरा साया बन मंजिल तक साथ चलने की ख्वाहिश थी मेरी
वक़्त की लहरों से बस इतनी सी ही गुजारिश थी मेरी
आज मगर जब जुदा हो गए हैं हमारे रास्ते इस तरह
तेरे अक्स को दिल में बसाये मैं दिन रात सफ़र किया करता हूँ
वो हसीं लम्हे आज भी मेरी यादों में छाये हैं
तेरी एक झलक को अब भी तलाशती मेरी ये निगाहें हैं
दरिया बन तुम तो कब की बह कर जा चुकी हो
मैं तो तालाब का पानी बन फिर भी तेरा इंतज़ार किया करता हूँ
आखिर क्यूँ यूँ बसंत के बाद पतझड़ का आना होता है
क्यूँ अचानक ख्वाबो का टूट कर बिखर जाना होता है
जानता हूँ ये की हर हसरत हकीकत नहीं बन पाती
इस सच को मगर रोज़ झुठलाने की कोशिश किया करता हूँ ...