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Tuesday, November 24, 2009

इस सच को मगर ...........













हर सहर खुद से तुझे भूल जाने का वादा किया करता हूँ
मगर दिल ही दिल में तो तेरे लौट आने की दुआ किया करता हूँ
यूँ तो छोड़ गयी तेरी कश्ती मेरा साहिल कब का
हवाओं से मैं फिर भी उसे मोड़ लाने की उम्मीद किया करता हूँ

तेरा साया बन मंजिल तक साथ चलने की ख्वाहिश थी मेरी
वक़्त की लहरों से बस इतनी सी ही गुजारिश थी मेरी
आज मगर जब जुदा हो गए हैं हमारे रास्ते इस तरह
तेरे अक्स को दिल में बसाये मैं दिन रात सफ़र किया करता हूँ

वो हसीं लम्हे आज भी मेरी यादों में छाये हैं
तेरी एक झलक को अब भी तलाशती  मेरी ये निगाहें हैं
दरिया बन तुम तो कब की बह कर जा चुकी हो
मैं तो तालाब का पानी बन फिर भी तेरा इंतज़ार किया करता हूँ

आखिर क्यूँ यूँ बसंत के बाद पतझड़ का आना होता है
क्यूँ अचानक ख्वाबो का टूट कर बिखर जाना होता है
जानता हूँ ये की हर हसरत हकीकत नहीं बन पाती
इस सच को मगर रोज़ झुठलाने की कोशिश किया करता हूँ ...

Monday, November 16, 2009

मेरे माता पिता को समर्पित एक कविता













बचपन में वो चलना मेरा
लडखडाना और गिरना मेरा
आपका कर देना मेरे आंसुओं को किनारे
और फिर मुस्कुराना मेरा

याद हैं वो किस्से आज भी
जो आपने मुझे सुनाये थे
मेरी नींद की खातिर जब
आप भी सो नहीं पाए थे

मेरी राह के बेशुमार कांटे
सब आपने ही तो चुने थे
ख्वाबो के ये खूबसूरत घरोंदे
आपने ही तो बुने थे

मुश्किलों की कड़ी धुप ने
जब भी मुझे डराया था
आपने ही तो दरख़्त  बनकर 
मुझे अपने साए में छुपाया था

कभी कभी कहता है दिल
फिर बीते लम्हों में लौट जाऊ
नन्हा सा वही बच्चा बन
आपकी बाँहों में सिमट जाऊ

Friday, November 13, 2009

ये भंवर तुम्हारी मंजिल नहीं














कब तक यूँ खामोशी का लिबास ओढे रहोगी
बस सुनोगी मुझे तुम, क्या खुद कुछ न कहोगी?

टूटती हैं उम्मीदें जब, दिल में गहरा  घाव छोड़  जाती हैं
वक़्त का मरहम लगने दो अब, कब तक इस दर्द को सहोगी?

जिन्दगी एक चंचल नदिया है और  यादें एक ठहराव
ये भंवर  तुम्हारी  मंजिल  नहीं, फिर क्यूँ इस पड़ाव पे रुकोगी?

रिश्ते बेर के फल की तरह है, कभी मीठे तो कभी खट्टे
एक कड़वे अनुभव को याद कर, दोस्त बनाने से कब तक डरोगी?

ग़म के चाँद लम्हों के लिए, अपने आंसुओं को यूँ जाया न करो 
खुशियों के कई लम्हे अभी बाकी हैं, तब क्या रोते हुए न हंसोगी? 

Wednesday, November 11, 2009

धुंधला नहीं है वजूद मेरा













एक अनजान पहेली नहीं मैं जिसे तुम जान न सको
धुंधला नहीं है वजूद मेरा कि तुम मुझे पहचान न सको

करवटें बदलती रहती हैं लहरें तो क्या मगर
गुम  नहीं होते साहिल यूँ की तुम उन्हें तलाश ना सको

इन हवाओं में यहाँ नहीं है असर अभी इतना कि
रेत पर मेरे कदमो के निशान तुम पा न सको

जिंदगी की दौड़ में कहीं आगे निकल गया हूँ मैं
इतना पराया तो नहीं की आवाज़ दे मुझे बुला न सको

एक पल के लिए ही, कभी मेरा अक्स जेहन में ले आना
ये कोई ऐसा वादा तो नहीं जिसे तुम निभा न सको

कभी याद बन तुम्हारी आँखों में उमड़ भी आऊं तो
इतना अजीज भी नहीं की पलकों में तुम मुझे छुपा न सको