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Sunday, January 24, 2010

कुछ खामोशियों में तुम्हे सुनता हूँ......

















तुम यहाँ नहीं हो मगर तुम्हारी मौजूदगी का मुझे एहसास है
नज़र नहीं आते तो क्या, मुझे तुम्हारे वजूद पर विश्वास है

रेत पर लेटकर आसमा से मैं आज भी बातें किया करता हूँ
सितारों की महफ़िल में ही कहीं तुम्हारी झलक देखा करता हूँ

उगते सूरज की किरणों में भी मुझे तुम्हारी छवि नज़र आती है
मेरी हर सुबह को वो रौशनी से सराबोर कर जाती है

तनहाइयों में रहकर भी मैं कभी तनहा नहीं होता हूँ
कुछ कहता हूँ खुद ,कुछ खामोशियों में तुम्हे सुनता हूँ

यूँ तो मुस्कुराने को मैंने अपनी आदत बना लिया है
तुम्हारी यादों को अस्तित्व का मेरे हिस्सा बना लिया है

फिर भी कभी अचानक ही आँखें पानी छलका देती हैं
ज़िन्दगी की कडवी हकीकत से रूबरू करवा देती हैं

मगर मुझे खोना नहीं है ,बिखर नहीं जाना है
तुम्हे जिन्दा रखने की खातिर मुझे भी जीते जाना है