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Saturday, February 13, 2010

शायद अफसाना पहले प्यार का कुछ इसी तरह बयां होता है


















जब तुमने मेरे चेहरे को अपने हाथों से छुआ था
मेरे मन के तारों में एक स्वर प्रस्फुटित हुआ था

मुस्कुराकर जब तुमने अपनी पलकों को झुकाया था
क्या कहता तुमसे, तब मैं खुद भी शरमाया था

अनगिनत बातें तुम्हारी सारी-सारी रात मैंने सुनी थी
छत के एक कोने में बैठ कई रूमानी गज़लें बुनी थी

तुम्हारी ख्वाहिशों के इर्द-गिर्द ही मैंने अपने सारे ख्वाब रचे थे
जब-जब बदले तुम्हारे अरमान, मेरे सपने भी साथ-साथ बदले थे

तुम पूछा करती थी, क्यूँ आजकल मैं अनायास ही मुस्कुरा देता हूँ
न जाने किस के ख्यालों में रास्तो पर बेहिसाब ठोकरें खा लेता हूँ

कैसे कहता तुमसे की मेरे खुशनुमा सुबहो का सबब तुम ही तो हो
किसी समंदर सी शांत मेरी शामों की चहक तुम ही तो हो

मोहब्बत की कोई परिभाषा नहीं होती, वो पत्तो पर फिसलती ओस की तरह होती है
जीने के लिए शायद जरुरी ना हो, मगर ज़िन्दगी उस बिन खूबसूरत नहीं होती है

आज भी वो हसीं लम्हे मेरी आँखों में चमक ले आते हैं
सावन की टपकी पहली बूँद सा सुकून दे जाते हैं

कभी हँसता कभी रोता हुआ यादों का वो कारवां होता है
शायद अफसाना पहले प्यार का कुछ इसी तरह बयां होता है

Monday, February 01, 2010

तेरे सर का बादल बन जाने का ख्वाब था














है नहीं कोई खूबसूरत वजह कि अपने गुनाहों को छुपा सकूँ
लबों पे मुस्कराहट लाऊ और पलकों में आंसू छुपा सकूँ |

मैं तो मंजर में ही गुम हो गया यूँ, काफिला चलता रहा मंजिल की ओर
अब तो बस तन्हाई है सफ़र में, मंजिल का न कोई ओर न छोर |

किसी का आइना बन जाना मंजूर न था, खुद का अक्स भी तलाश न पाए
तेरे सर का बादल बन जाने का ख्वाब  था, रास्ते का दरख़्त तक बन न पाए |

अब तो खामोशियाँ भी कर गयी किनारा, हवाएं  भी मुझे सहलाती नहीं है
लहरों से मेरा दोस्ताना कब था, वो भी दिल को मगर दहलाती नहीं है |

इतनी सी गुजारिश है अब वक़्त से मेरी, दो नए पल जिंदगी के पा तो सकूँ
चाहे न दे खुशियों के साज़ नए, यादों के कुछ नगमे गुनगुना तो सकूँ |