जब तुमने मेरे चेहरे को अपने हाथों से छुआ था
मेरे मन के तारों में एक स्वर प्रस्फुटित हुआ था
मुस्कुराकर जब तुमने अपनी पलकों को झुकाया था
क्या कहता तुमसे, तब मैं खुद भी शरमाया था
अनगिनत बातें तुम्हारी सारी-सारी रात मैंने सुनी थी
छत के एक कोने में बैठ कई रूमानी गज़लें बुनी थी
तुम्हारी ख्वाहिशों के इर्द-गिर्द ही मैंने अपने सारे ख्वाब रचे थे
जब-जब बदले तुम्हारे अरमान, मेरे सपने भी साथ-साथ बदले थे
तुम पूछा करती थी, क्यूँ आजकल मैं अनायास ही मुस्कुरा देता हूँ
न जाने किस के ख्यालों में रास्तो पर बेहिसाब ठोकरें खा लेता हूँ
कैसे कहता तुमसे की मेरे खुशनुमा सुबहो का सबब तुम ही तो हो
किसी समंदर सी शांत मेरी शामों की चहक तुम ही तो हो
मोहब्बत की कोई परिभाषा नहीं होती, वो पत्तो पर फिसलती ओस की तरह होती है
जीने के लिए शायद जरुरी ना हो, मगर ज़िन्दगी उस बिन खूबसूरत नहीं होती है
आज भी वो हसीं लम्हे मेरी आँखों में चमक ले आते हैं
सावन की टपकी पहली बूँद सा सुकून दे जाते हैं
कभी हँसता कभी रोता हुआ यादों का वो कारवां होता है
शायद अफसाना पहले प्यार का कुछ इसी तरह बयां होता है