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Sunday, April 04, 2010

कहीं न कहीं तो जरुर मिलेगा मेरी तिशनगी को सुकून



















कुछ अनचाहे तुफानो ने मेरी कश्ती को घेरा हुआ है
न जाने क्यूँ हर पल जिंदगी का इस कदर ठहरा हुआ है

मुट्ठी में आते आते क्यूँ फिसल जाती है कामयाबी
आसान से सवालों में क्यूँ उलझ जाती है जिंदगी

अपने अतीत की सुनहरी यादों से मैं घबराने लगा हूँ
नाकामियों की झुलसती धुप में मुरझाने लगा हूँ

आँखों से बहने से अब आंसू भी कतराने लगे हैं
होश में हूँ मगर कदम फिर भी लड़खड़ाने लगे हैं

क्या थे मेरे जज़्बात और क्या मेरी हस्ती थी
बिखरने से पहले यहाँ मेरे अरमानो की बस्ती थी

न जाने कब तक मुझे तपते रेगिस्तान में चलते जाना है
किस्मत के अजीब खेल को यहाँ आखिर किसने जाना है

मगर मुझमे भी है लड़ते रहने का जज्बा और जूनून
कहीं न कहीं तो जरुर मिलेगा मेरी तिशनगी को सुकून