बेरुखी के आलम में उम्मीदों का लिबास था
मैं तेरा ख्याल नहीं, इस का मुझे आभास था
अनगिनत कही उन बातों का कोई मतलब नहीं था
इस हकीकत को झुठला पाने में मगर मैं नाकाम था
उसकी ख्वाहिशों से शायद मैं वाकिफ नहीं था
मगर अपने सुन्दर ख्वाब तोड़ देना मुनासिब नहीं था
तुमने खफा होने के लिए ढूंढ़ लिया था एक बहाना
मेरे लिए हजारों वजहों का होना भी काफी नहीं था
तुमने मुझे समझा नहीं, न मैं तुम्हे जान पाया
न जाने क्या था वो जो मुझे तुम्हारे करीब लाया
तुमने मुझे कभी उन निगाहों से ना देखा हो
मैंने सदा समझा है तुम्हे अपना हमसाया
अब मैं इन गलियों में तनहा ही सफ़र किया करता हूँ
दोस्तों से हंसकर कभी कभी मिल भी लिया करता हूँ
ये ना सोचना कि मिट चुका है तुम्हारा अस्तित्व मेरे जेहन से
तुम्हारे खयालो के सहारे ही हँसते हुए जी लिया करता हूँ