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Monday, March 15, 2010

एक शहीद के नाम उसकी बीवी की पाती


















इस कविता से पहले ये कुछ पंक्तियाँ लिखनी जरुरी थी क्यूंकि शीर्षक से जैसा आभास होता है, कविता वैसी नहीं है | ये कहना आसान है कि एक शहीद की पत्नी होने पे गर्व की अनुभूति होनी चाहिए |  मगर यथार्थ में उस औरत पे क्या बीतती है, जो पहले तो महीनो-महीनो अपने पति से दूर रहती है और फिर एक दिन सदा के लिए उसका साथ गँवा देती है, हम नहीं जानते | ये ऐसी ही एक शहीद की विधवा की व्यथा कहने का मेरा प्रयास है |  

अब मुझे हर पल याद नहीं आती है तुम्हारी
आंसुओ से नहीं भीगती है आजकल मेरी साड़ी |

अब मैं तुम्हारा इंतज़ार नहीं किया करती हूँ
पलकें मीचे सारी रात नहीं जगा करती हूँ  |

अब भुला चुकी हूँ मैं तुम्हारे सख्त हाथों का स्पर्श
अब नहीं उठती निगाहें तुम्हारी तस्वीर की ओर बरबस |

अब मुझे रातों को मीठे-मीठे ख्वाब नहीं आते हैं
अब सारे आंसू पलकों की कैद में ही सूख जाते हैं |

अब तनहाइयाँ मेरा कोई भी इम्तिहान नहीं लेती हैं
अब सूनी कलाई कुछ न होने का आभास नहीं देती हैं  |

अब नहीं है मुझे तुमसे कोई भी गिला शिकवा
अब मैं नहीं मांगती हूँ उपरवाले से कोई दुआ |

अब मुझे कुरेदता नहीं है तुम्हारा वादों को तोड़ देना
अब मैंने छोड़ दिया है हकीकत से मुंह मोड़ लेना |

अब मुझे हर पल याद नहीं आती है तुम्हारी
आंसुओ से नहीं भीगती है आजकल मेरी साड़ी |




                                                         

Saturday, March 06, 2010

Wednesday, March 03, 2010

मैं क्या हूँ और न जाने क्या बन जाना चाहता हूँ .......


















मैं क्या हूँ और न जाने क्या बन जाना चाहता हूँ

शायद किसी की तलाश हूँ, मंजिल बन जाना चाहता हूँ
या हूँ सेहरा की धुप और बादल बन जाना चाहता हूँ

शायद अजनबी हूँ किसी के लिए, दोस्त बन जाना चाहता हूँ
या हूँ एक ठहरा हुआ दरख़्त और बहती पवन बन जाना चाहता हूँ

शायद कोई भूली हुई कहानी हूँ, हकीकत बन जाना चाहता हूँ
या हूँ अक्स किसी का और अब खुद शख्सियत बन जाना चाहता हूँ

शायद एक कोरा कागज़ हूँ, किसी का पैगाम बन जाना चाहता हूँ
या हूँ बीती हुई रात और एक नयी सहर बन जाना चाहता हूँ

शायद ढेरो अनकही बातें हूँ, जुबान बन जाना चाहता हूँ
या हूँ पैरों की ज़मीन और आसमान बन जाना चाहता हूँ

शायद सिसकती आवाज़ हूँ, ख़ुशी की चहक बन जाना चाहता हूँ
या हूँ टूटा हुआ साज़ और मोसिकी बन जाना चाहता हूँ

शायद कडवी यादों का सबब हूँ, मीठे लम्हों का एहसास बन जाना चाहता हूँ
या हूँ आँखों से टपकता पानी और ओस की बूँद बन जाना चाहता हूँ

मैं क्या हूँ और न जाने क्या बन जाना चाहता हूँ

Saturday, February 13, 2010

शायद अफसाना पहले प्यार का कुछ इसी तरह बयां होता है


















जब तुमने मेरे चेहरे को अपने हाथों से छुआ था
मेरे मन के तारों में एक स्वर प्रस्फुटित हुआ था

मुस्कुराकर जब तुमने अपनी पलकों को झुकाया था
क्या कहता तुमसे, तब मैं खुद भी शरमाया था

अनगिनत बातें तुम्हारी सारी-सारी रात मैंने सुनी थी
छत के एक कोने में बैठ कई रूमानी गज़लें बुनी थी

तुम्हारी ख्वाहिशों के इर्द-गिर्द ही मैंने अपने सारे ख्वाब रचे थे
जब-जब बदले तुम्हारे अरमान, मेरे सपने भी साथ-साथ बदले थे

तुम पूछा करती थी, क्यूँ आजकल मैं अनायास ही मुस्कुरा देता हूँ
न जाने किस के ख्यालों में रास्तो पर बेहिसाब ठोकरें खा लेता हूँ

कैसे कहता तुमसे की मेरे खुशनुमा सुबहो का सबब तुम ही तो हो
किसी समंदर सी शांत मेरी शामों की चहक तुम ही तो हो

मोहब्बत की कोई परिभाषा नहीं होती, वो पत्तो पर फिसलती ओस की तरह होती है
जीने के लिए शायद जरुरी ना हो, मगर ज़िन्दगी उस बिन खूबसूरत नहीं होती है

आज भी वो हसीं लम्हे मेरी आँखों में चमक ले आते हैं
सावन की टपकी पहली बूँद सा सुकून दे जाते हैं

कभी हँसता कभी रोता हुआ यादों का वो कारवां होता है
शायद अफसाना पहले प्यार का कुछ इसी तरह बयां होता है

Monday, February 01, 2010

तेरे सर का बादल बन जाने का ख्वाब था














है नहीं कोई खूबसूरत वजह कि अपने गुनाहों को छुपा सकूँ
लबों पे मुस्कराहट लाऊ और पलकों में आंसू छुपा सकूँ |

मैं तो मंजर में ही गुम हो गया यूँ, काफिला चलता रहा मंजिल की ओर
अब तो बस तन्हाई है सफ़र में, मंजिल का न कोई ओर न छोर |

किसी का आइना बन जाना मंजूर न था, खुद का अक्स भी तलाश न पाए
तेरे सर का बादल बन जाने का ख्वाब  था, रास्ते का दरख़्त तक बन न पाए |

अब तो खामोशियाँ भी कर गयी किनारा, हवाएं  भी मुझे सहलाती नहीं है
लहरों से मेरा दोस्ताना कब था, वो भी दिल को मगर दहलाती नहीं है |

इतनी सी गुजारिश है अब वक़्त से मेरी, दो नए पल जिंदगी के पा तो सकूँ
चाहे न दे खुशियों के साज़ नए, यादों के कुछ नगमे गुनगुना तो सकूँ |

Sunday, January 24, 2010

कुछ खामोशियों में तुम्हे सुनता हूँ......

















तुम यहाँ नहीं हो मगर तुम्हारी मौजूदगी का मुझे एहसास है
नज़र नहीं आते तो क्या, मुझे तुम्हारे वजूद पर विश्वास है

रेत पर लेटकर आसमा से मैं आज भी बातें किया करता हूँ
सितारों की महफ़िल में ही कहीं तुम्हारी झलक देखा करता हूँ

उगते सूरज की किरणों में भी मुझे तुम्हारी छवि नज़र आती है
मेरी हर सुबह को वो रौशनी से सराबोर कर जाती है

तनहाइयों में रहकर भी मैं कभी तनहा नहीं होता हूँ
कुछ कहता हूँ खुद ,कुछ खामोशियों में तुम्हे सुनता हूँ

यूँ तो मुस्कुराने को मैंने अपनी आदत बना लिया है
तुम्हारी यादों को अस्तित्व का मेरे हिस्सा बना लिया है

फिर भी कभी अचानक ही आँखें पानी छलका देती हैं
ज़िन्दगी की कडवी हकीकत से रूबरू करवा देती हैं

मगर मुझे खोना नहीं है ,बिखर नहीं जाना है
तुम्हे जिन्दा रखने की खातिर मुझे भी जीते जाना है

Thursday, December 17, 2009

गुंजाईश - 1

" कुछ छूट रहा है क्या ?" शशि ने पूछा
" हाँ " मैंने एक लम्बी सांस ली " ढेर सारी यादें ... "
"बस यादें ?" उसने मेरी बात बीच में ही काट अपना तीखा सवाल दाग दिया |

शायद नहीं, सिर्फ यादें नहीं छोड़ कर जाऊँगा मैं यहाँ से | कोई और भी यहीं छूट रहा है, मगर ये सिर्फ मेरा वहम भी हो सकता है | हाँ, ये मेरा वहम ही है |

" हाँ , बस यादें | तू कार लायी है न अपनी, ये बैग और सूटकेस फटाफट पीछे डाल दे. तेरी बातों के चक्कर में लेट हो जायेंगे  " मैं जल्दी से बोला |

"मिस्टर बहानेबाज |" शशि पे कोई असर नहीं हुआ "ट्रेन अभी तक स्टेशन पहुची भी नहीं होगी और वैसे भी हम सिर्फ ३ किलोमीटर दूर हैं | अ डिस्टेंस ऑफ़ ओनली ३ किलोमीटर | तू भी जानता हैं मैं नैना की बात कर रही हूँ. "

"तू जानती है की हमारे बीच जो भी था वो...... "

"मगर तेरा चेहरा तेरी उस बात को सप्पोर्ट नहीं करता | या तो तू झूठ बोल रहा है या फिर तेरा चेहरा |"

अपने चेहरे के भाव छुपाना मुझे कभी नहीं आया | शशि का कहना सही था | मैं नैना को मिस कर रहा था हालाँकि ऐसा होना नहीं चाहिए था | इसकी कोई वजह भी नहीं थी |


हमारा रिश्ता शुरू से आखिर तक स्वार्थ पे ही टिका रहा था | उसमे कहीं भावनाओ के आने की गुंजाईश न तो मैंने रखी थी न ही उसने |


मुझे याद है वो दिन जब मैंने उसे पहली बार कॉलेज कैम्पस  में देखा था | मैं तब सेकंड इअर में आ चुका था और सीनेएर  बन चुका था | कॉलेज में रेग्गिंग की सख्त मनाही थी मगर तब भी लड़के लड़कियां कहीं न कहीं जुनिएर्स को घेर ही लेते | मेरे दोस्त भी इसी कोशिश में थे और उनसे जो लड़की टकराई वो नैना थी | मैं हालाँकि रेग्गिंग में शामिल नहीं होता था मगर कभी कभी वहां खड़े होकर मज़े जरुर लूट लेता था | नैना ने पहली बार में मेरा ध्यान खीच लिया था | इसका कारण था एक अदद आत्मविश्वास,  a certain assertiveness | वो उसका कॉलेज का पहला दिन था मगर वो जरा भी घबराई न थी | मुझे पहली बार में वो बेहद खुबसूरत तो नहीं लगी लेकिन मैं उसकी ओर आकर्षित जरुर हुआ | मेरे दोस्तों ने उसकी रेग्गिंग लेने की नाकाम कोशिश की | उस नाकाम कोशिश के बाद उन्हें प्रिंसिपल से डांट और झेलनी पड़ी क्योंकि  नैना ने उनकी शिकायत कर दी थी | आते ही वो कॉलेज में छा  गई थी |

" लास्ट एसेमेस ६ दिन पहले का है | पिछले ४ दिनों में कोई कॉल भी नहीं है | मतलब उस तरफ से कुछ भी नहीं है |" शशि मेरा फ़ोन उलटते पुलटते बोली |

"इधर से भी कुछ नहीं है" मैं झल्लाते हुए बोला " मेरा फ़ोन छेड़ना बंद कर | उसमे कुछ नहीं है |"

" तुने लास्ट सेमेस्टर के नोट्स दे दिए क्या उसे ?| शशि ने फ़ोन थमाते हुए पूछा |

"हाँ | ५ दिन पहले दे चुका हूँ, उसके पेपर ख़तम होते ही | "

नोट्स, बुक्स, टेस्ट पेपर्स - यही बड़ी वजह से उसकी मेरे पास आने की | उस रेग्गिंग हादसे के बाद सीनीयर्स ने फैसला कर लिया था की नैना की किसी भी तरह की कोई मदद नहीं की जाएगी | नैना ने पहले साल तो इस बात के टेंशन नहीं ली मगर दुसरे साल में जब उसकी अपनी ब्रांच की क्लास शुरू की तब उसे एहसास हुआ की सीनीयर्स की मदद के बिना उसे आगे बहुत दिक्कत होने वाली है , मगर तब तक समझौते की उम्मीदें भी ख़तम हो चुकी थी |

" तू उसकी पिक्चर में आया कब ?" शशि ने पूछा

" तीसरे साल, जब अपनी ब्रांच के ज्यादातर सीनीयर्स ने उसकी मदद से इंकार कर दिया. "

"हम्म .... उन्ही दिनों तू एक गर्लफ्रेंड के लिए बड़ा उतावला हो रहा था | मुझे अच्छी तरह याद है | तो इस तरह से हुई तुम लोगो की सेटिंग | "

जब नैना ने ये ऑफर मेरे सामने रखा था तो मैं  हक्का बक्का रह गया था | वो कुछ शर्तो के साथ मेरी गर्लफ्रेंड  बनने  को तैयार थी अगर मैं बदले में उसे सब नोट्स और किताबें देता रहता इंजीनियरिंग के आखिर तक.|


"तुम पागल हो क्या ? ये क्या डील हुई ? ये तो खुदगर्जी की इन्तहा है |"


" इसमें गलत क्या है? आपको पता है की बिना सीनीयर्स की मदद के मुझे बहुत मुश्किल होने वाली है और यहाँ मैंने सब से ही पंगा ले रखा है | मुझे पता है की आपको डर है की अगर आपने मेरी मदद की तो आपके ही दोस्त आपके खिलाफ हो जायेंगे | इसके लिए बेहतर है की आप मुझे अपनी गर्लफ्रेंड बना लीजिये | इसमें आपका भी फायदा है और मेरा भी , साथ ही मेरी मदद करने पर आप पर कोई उंगली भी नहीं उठाएगा |"


"मतलब तुम ओके हो इस बात से | लोग मुझे तुम्हारा बोय्फ्रेंड कहेंगे और तुमे कोई फर्क नहीं पड़ेगा ... मतलब मैं तुम्हारा सीनीएर हूँ और....... |"


" आपके कई दोस्तों की जी एफ्स  मेरी क्लास मेटस हैं | आप कोई अपराध नहीं करोगे ऐसा करके | ये गिव एंड टेक का जमाना है | आपको कॉलेज में दिखने को गर्लफ्रेंड मिल रही है और मुझे आपकी हेल्प | इसमें क्या बुराई है?"


आखिर मैं उसकी बात मान गया | दुनिया को दिखाने  को आज मेरे पास भी एक गर्लफ्रेंड थी | सोचने में आज भले ही ये बचकानी बात लगे मगर तब मैं इस बात से काफी खुश हुआ था | कॉलेज की ज़िन्दगी आखिर होती ही कुछ इस तरह की है |

" मेरे ख्याल से हमें अब रवाना होना चाहिए |" शशि मुझे यादों के भंवर से बाहर खीच लायी | मैंने पीछे पलट कर अपने हॉस्टल की ईमारत को आखिरी बार देखा | इसी जगह अपने घर से मीलो दूर मैंने एक घर पाया था | इस जगह और अपने कॉलेज से मेरी सेकड़ो यादें जुडी हुई हैं | ४ साल का अरसा यूँ देखो तो कम  है और यूँ देखो तो उसमे हजारो दिन और लाखों पल है | एक याद बनाने को तो चंद लम्हे ही काफी होते हैं |