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Monday, November 16, 2009

मेरे माता पिता को समर्पित एक कविता













बचपन में वो चलना मेरा
लडखडाना और गिरना मेरा
आपका कर देना मेरे आंसुओं को किनारे
और फिर मुस्कुराना मेरा

याद हैं वो किस्से आज भी
जो आपने मुझे सुनाये थे
मेरी नींद की खातिर जब
आप भी सो नहीं पाए थे

मेरी राह के बेशुमार कांटे
सब आपने ही तो चुने थे
ख्वाबो के ये खूबसूरत घरोंदे
आपने ही तो बुने थे

मुश्किलों की कड़ी धुप ने
जब भी मुझे डराया था
आपने ही तो दरख़्त  बनकर 
मुझे अपने साए में छुपाया था

कभी कभी कहता है दिल
फिर बीते लम्हों में लौट जाऊ
नन्हा सा वही बच्चा बन
आपकी बाँहों में सिमट जाऊ

3 comments:

Unknown said...

Hey great work man just keep writing and keep blogging. very nice.

Tarun........ said...

bachpan ki wo yaaden yaad aa gayee.....
teri kavitayen mujhe wo bite pal dekha gayee..........

keep it up nice one........

Unknown said...

This is the one..
mast hai, aise poems hi likha kar,
इस सच को मगर ... jaise nahi
vo bhi achhi hai par ye to best hai

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