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Tuesday, November 24, 2009

इस सच को मगर ...........













हर सहर खुद से तुझे भूल जाने का वादा किया करता हूँ
मगर दिल ही दिल में तो तेरे लौट आने की दुआ किया करता हूँ
यूँ तो छोड़ गयी तेरी कश्ती मेरा साहिल कब का
हवाओं से मैं फिर भी उसे मोड़ लाने की उम्मीद किया करता हूँ

तेरा साया बन मंजिल तक साथ चलने की ख्वाहिश थी मेरी
वक़्त की लहरों से बस इतनी सी ही गुजारिश थी मेरी
आज मगर जब जुदा हो गए हैं हमारे रास्ते इस तरह
तेरे अक्स को दिल में बसाये मैं दिन रात सफ़र किया करता हूँ

वो हसीं लम्हे आज भी मेरी यादों में छाये हैं
तेरी एक झलक को अब भी तलाशती  मेरी ये निगाहें हैं
दरिया बन तुम तो कब की बह कर जा चुकी हो
मैं तो तालाब का पानी बन फिर भी तेरा इंतज़ार किया करता हूँ

आखिर क्यूँ यूँ बसंत के बाद पतझड़ का आना होता है
क्यूँ अचानक ख्वाबो का टूट कर बिखर जाना होता है
जानता हूँ ये की हर हसरत हकीकत नहीं बन पाती
इस सच को मगर रोज़ झुठलाने की कोशिश किया करता हूँ ...

5 comments:

Anonymous said...

Nice poem.........
Keep penning
:)

Unknown said...

bahut achhi hai...........
par abhi DEvdas banne ka sahi waqt nahi hai.
Ek gai to dusri aayegi, jo tera saath Nebhaegi.

Anonymous said...

kya likhta hai bhai tu..phoda yaar..kuchh line toh dil mein utar gayee..awesome

Anjit said...

dil ko chhoo gayi yaar,
keep writing

Sun said...

Hi Friend ur doing an excellent work.. Can we exchange links...

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