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Saturday, October 09, 2010

इस तब्दीलियों के जहाँ में मेरे लिए ये एहसास ही बहुत ख़ास है

ये कैसी तलाश है जो अंजाम तक नहीं पहुचती है 
मुझसे होती है शुरू और ख़त्म भी मुझ पर होती है

ये देखो रेत के वो किले जो रोज़ बनते-बिगड़ते हैं
इनमे छुपे हैं कुछ अरमान जो कभी नहीं मरते हैं

जिंदगी की बिसात पर किस्मत अपनी चाल चलती है
शह और मात की ये दास्तान बरसो अनवरत चलती है

मैं परेशान नहीं मगर हैरान हूँ इंसानों के इस अजीब फलसफे से
किसी के व्यक्तित्व की पहचान है सिर्फ कामयाबी-नाकामयाबी से

अपने अस्तित्व के दो हिस्सों से आजकल रूबरू हो रहा हूँ
कभी वर्तमान में तो कभी अतीत की यादों में जी रहा हूँ 

वक़्त के सैलाब तले अपना यकीन जो खो दे कोई
बाकी क्या रहें जब वजूद की बुनियाद खो दे कोई

आज तुम नहीं हो मगर तुम्हारी मौजूदगी का मुझे आभास है
इस तब्दीलियों के जहाँ में मेरे लिए ये एहसास ही बहुत ख़ास है