ये कैसी तलाश है जो अंजाम तक नहीं पहुचती है
मुझसे होती है शुरू और ख़त्म भी मुझ पर होती है
ये देखो रेत के वो किले जो रोज़ बनते-बिगड़ते हैं
इनमे छुपे हैं कुछ अरमान जो कभी नहीं मरते हैं
जिंदगी की बिसात पर किस्मत अपनी चाल चलती है
शह और मात की ये दास्तान बरसो अनवरत चलती है
मैं परेशान नहीं मगर हैरान हूँ इंसानों के इस अजीब फलसफे से
किसी के व्यक्तित्व की पहचान है सिर्फ कामयाबी-नाकामयाबी से
अपने अस्तित्व के दो हिस्सों से आजकल रूबरू हो रहा हूँ
कभी वर्तमान में तो कभी अतीत की यादों में जी रहा हूँ
वक़्त के सैलाब तले अपना यकीन जो खो दे कोई
बाकी क्या रहें जब वजूद की बुनियाद खो दे कोई
आज तुम नहीं हो मगर तुम्हारी मौजूदगी का मुझे आभास है
इस तब्दीलियों के जहाँ में मेरे लिए ये एहसास ही बहुत ख़ास है





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