बादलों में कहीं चाँद धीमे धीमे छुप रहा होगा
समंदर भी लहरें समेटे बेसुध चुप रहा होगा
उसके चले जाने का एहसास भी ना हुआ मुझे
मेरी पलकों में कोई ख्वाब शायद बस रहा होगा
कांपते होठों पर कोई अल्फाज़ दबा रहा होगा
मन के दरिया के बीच जरुर कोई भंवर रहा होगा
इस तरह ख़ामोशी से बैठना शगल नहीं मेरा
वो मंजर ही शायद कुछ अजीब रहा होगा
सुलगते हुए शोलों पर पानी बरस रहा होगा
कहीं कोने में एक अरमान सिसक रहा होगा
भूलने की कोशिश में यूँ उलझ गएहैं यादों के बीच
दर्द चेहरे पर नहीं मगर दिल में रहा होगा
उसका कोई ख्वाब भी उससे दूर रहा होगा
एकाकी उसका मन बहुत मजबूर रहा होगा
हकीकत और फ़साने में फर्क नहीं समझता मैं
उसके दिल में मेरा ख्याल मगर जरूर रहा होगा





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