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Friday, August 20, 2010

तुम्हारे साथ मैं क्या था, तुम्हारे बगैर क्या बन चुका हूँ ....













तुम उस मोड़ पर इस कदर ठहरी हो, मैं इस किनारे पर उस कदर रुका हूँ
भविष्य की ओर झाँकने का बहाना कर वर्तमान में अतीत बन चुका हूँ

तुम अगर सेहरा में मुरझाया हुआ कोई शुष्क सुमन हो चुकी हो, 
मैं पथरीले रास्तों के किनारों का सूखा हुआ एक ठूंठ बन चुका हूँ 

तुमने भी शायद फिर से अपने पंखों को हवा में यूँ फैलाया नहीं 
मैं भी उन बेशकीमती सैकरो यादों का कैदी बन चुका हूँ 

वो क्या है जो तुम्हे अक्सर अपने आवेग में बहा ले जाता है 
देख इधर मैं भी अपनी तनहाइयों का मुरीद बन चुका हूँ

बेचैन रातों से तुमने दोस्ताना ना जाने कब से कर लिया  
यहाँ अपने ही ख्वाबों के लिए मैं अजनबी बन चुका हूँ

ना जाने किस जिद में फासले यूँ बढ़ गए हैं हमारे दरमियाँ
तुम्हारे साथ मैं क्या था, तुम्हारे बगैर क्या बन चुका हूँ 

1 comments:

Rachana Mishra said...

Wow........very nicely written...
Good...keep it up

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