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Sunday, July 11, 2010

जाने क्यूँ हम अंधेरो की मौजूदगी से इनकार करते हैं ....

अपने ही कदमों के निशानों को रास्तों पर तलाश करते हैं
जाने क्यूँ हम बीते हुए कल में जीने का प्रयास करते हैं

हम खुशियों में भी ढूंढते हैं ग़मगीन होने के हज़ार बहाने
जाने क्यूँ दूसरों की नाकामयाबी का बेसब्री से इंतज़ार करते हैं

जब खुद के ख्वाबो पर हमें ही नहीं ऐतबार जरा सा भी
जाने क्यूँ किस्मत की लकीरों की बात बार-२ किया करते हैं

किसी के अरमानो को पैरों तले बेदर्दी से कुचल डालते हैं हम
जाने क्यूँ उसे अपने आप से इस कदर बेजार करते हैं

जलती बुझती रोशनियों को जिंदगी की हकीकत मानते हैं
जाने क्यूँ हम अंधेरो की मौजूदगी से इनकार करते हैं

कुछ पल की ख़ुशी के लिए हजारों आंसू उधार ले लेते हैं
जाने क्यूँ हम खुदा को भूल जाने का गुनाह करते हैं

1 comments:

Chitra said...

I am Chitra Rana, I got this link from ISC. Ypur poems are really wonderful and superbly nice. All the best to a great writer in you!

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