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Friday, August 20, 2010

तुम्हारे साथ मैं क्या था, तुम्हारे बगैर क्या बन चुका हूँ ....













तुम उस मोड़ पर इस कदर ठहरी हो, मैं इस किनारे पर उस कदर रुका हूँ
भविष्य की ओर झाँकने का बहाना कर वर्तमान में अतीत बन चुका हूँ

तुम अगर सेहरा में मुरझाया हुआ कोई शुष्क सुमन हो चुकी हो, 
मैं पथरीले रास्तों के किनारों का सूखा हुआ एक ठूंठ बन चुका हूँ 

तुमने भी शायद फिर से अपने पंखों को हवा में यूँ फैलाया नहीं 
मैं भी उन बेशकीमती सैकरो यादों का कैदी बन चुका हूँ 

वो क्या है जो तुम्हे अक्सर अपने आवेग में बहा ले जाता है 
देख इधर मैं भी अपनी तनहाइयों का मुरीद बन चुका हूँ

बेचैन रातों से तुमने दोस्ताना ना जाने कब से कर लिया  
यहाँ अपने ही ख्वाबों के लिए मैं अजनबी बन चुका हूँ

ना जाने किस जिद में फासले यूँ बढ़ गए हैं हमारे दरमियाँ
तुम्हारे साथ मैं क्या था, तुम्हारे बगैर क्या बन चुका हूँ 

Sunday, July 11, 2010

जाने क्यूँ हम अंधेरो की मौजूदगी से इनकार करते हैं ....

अपने ही कदमों के निशानों को रास्तों पर तलाश करते हैं
जाने क्यूँ हम बीते हुए कल में जीने का प्रयास करते हैं

हम खुशियों में भी ढूंढते हैं ग़मगीन होने के हज़ार बहाने
जाने क्यूँ दूसरों की नाकामयाबी का बेसब्री से इंतज़ार करते हैं

जब खुद के ख्वाबो पर हमें ही नहीं ऐतबार जरा सा भी
जाने क्यूँ किस्मत की लकीरों की बात बार-२ किया करते हैं

किसी के अरमानो को पैरों तले बेदर्दी से कुचल डालते हैं हम
जाने क्यूँ उसे अपने आप से इस कदर बेजार करते हैं

जलती बुझती रोशनियों को जिंदगी की हकीकत मानते हैं
जाने क्यूँ हम अंधेरो की मौजूदगी से इनकार करते हैं

कुछ पल की ख़ुशी के लिए हजारों आंसू उधार ले लेते हैं
जाने क्यूँ हम खुदा को भूल जाने का गुनाह करते हैं

Friday, June 18, 2010

मेरे लिए हजारों वजहों का होना भी काफी नहीं था ...













बेरुखी के आलम में उम्मीदों का लिबास था
मैं तेरा ख्याल नहीं, इस का मुझे आभास था
अनगिनत कही उन बातों का कोई मतलब नहीं था
इस हकीकत को झुठला पाने में मगर मैं नाकाम था

उसकी ख्वाहिशों से शायद मैं वाकिफ नहीं था
मगर अपने सुन्दर ख्वाब तोड़ देना मुनासिब नहीं था
तुमने खफा होने के लिए ढूंढ़ लिया था एक बहाना
मेरे लिए हजारों वजहों का होना भी काफी नहीं था

तुमने मुझे समझा नहीं, न मैं तुम्हे जान पाया
न जाने क्या था वो जो मुझे तुम्हारे करीब लाया
तुमने मुझे कभी उन निगाहों से ना देखा हो
मैंने सदा समझा है तुम्हे अपना हमसाया

अब मैं इन गलियों में तनहा ही सफ़र किया करता हूँ
दोस्तों से हंसकर कभी कभी मिल भी लिया करता हूँ
ये ना सोचना कि मिट चुका है तुम्हारा अस्तित्व मेरे जेहन से
तुम्हारे खयालो के सहारे ही हँसते हुए जी लिया करता हूँ

Sunday, April 04, 2010

कहीं न कहीं तो जरुर मिलेगा मेरी तिशनगी को सुकून



















कुछ अनचाहे तुफानो ने मेरी कश्ती को घेरा हुआ है
न जाने क्यूँ हर पल जिंदगी का इस कदर ठहरा हुआ है

मुट्ठी में आते आते क्यूँ फिसल जाती है कामयाबी
आसान से सवालों में क्यूँ उलझ जाती है जिंदगी

अपने अतीत की सुनहरी यादों से मैं घबराने लगा हूँ
नाकामियों की झुलसती धुप में मुरझाने लगा हूँ

आँखों से बहने से अब आंसू भी कतराने लगे हैं
होश में हूँ मगर कदम फिर भी लड़खड़ाने लगे हैं

क्या थे मेरे जज़्बात और क्या मेरी हस्ती थी
बिखरने से पहले यहाँ मेरे अरमानो की बस्ती थी

न जाने कब तक मुझे तपते रेगिस्तान में चलते जाना है
किस्मत के अजीब खेल को यहाँ आखिर किसने जाना है

मगर मुझमे भी है लड़ते रहने का जज्बा और जूनून
कहीं न कहीं तो जरुर मिलेगा मेरी तिशनगी को सुकून

Monday, March 15, 2010

एक शहीद के नाम उसकी बीवी की पाती


















इस कविता से पहले ये कुछ पंक्तियाँ लिखनी जरुरी थी क्यूंकि शीर्षक से जैसा आभास होता है, कविता वैसी नहीं है | ये कहना आसान है कि एक शहीद की पत्नी होने पे गर्व की अनुभूति होनी चाहिए |  मगर यथार्थ में उस औरत पे क्या बीतती है, जो पहले तो महीनो-महीनो अपने पति से दूर रहती है और फिर एक दिन सदा के लिए उसका साथ गँवा देती है, हम नहीं जानते | ये ऐसी ही एक शहीद की विधवा की व्यथा कहने का मेरा प्रयास है |  

अब मुझे हर पल याद नहीं आती है तुम्हारी
आंसुओ से नहीं भीगती है आजकल मेरी साड़ी |

अब मैं तुम्हारा इंतज़ार नहीं किया करती हूँ
पलकें मीचे सारी रात नहीं जगा करती हूँ  |

अब भुला चुकी हूँ मैं तुम्हारे सख्त हाथों का स्पर्श
अब नहीं उठती निगाहें तुम्हारी तस्वीर की ओर बरबस |

अब मुझे रातों को मीठे-मीठे ख्वाब नहीं आते हैं
अब सारे आंसू पलकों की कैद में ही सूख जाते हैं |

अब तनहाइयाँ मेरा कोई भी इम्तिहान नहीं लेती हैं
अब सूनी कलाई कुछ न होने का आभास नहीं देती हैं  |

अब नहीं है मुझे तुमसे कोई भी गिला शिकवा
अब मैं नहीं मांगती हूँ उपरवाले से कोई दुआ |

अब मुझे कुरेदता नहीं है तुम्हारा वादों को तोड़ देना
अब मैंने छोड़ दिया है हकीकत से मुंह मोड़ लेना |

अब मुझे हर पल याद नहीं आती है तुम्हारी
आंसुओ से नहीं भीगती है आजकल मेरी साड़ी |




                                                         

Saturday, March 06, 2010

Wednesday, March 03, 2010

मैं क्या हूँ और न जाने क्या बन जाना चाहता हूँ .......


















मैं क्या हूँ और न जाने क्या बन जाना चाहता हूँ

शायद किसी की तलाश हूँ, मंजिल बन जाना चाहता हूँ
या हूँ सेहरा की धुप और बादल बन जाना चाहता हूँ

शायद अजनबी हूँ किसी के लिए, दोस्त बन जाना चाहता हूँ
या हूँ एक ठहरा हुआ दरख़्त और बहती पवन बन जाना चाहता हूँ

शायद कोई भूली हुई कहानी हूँ, हकीकत बन जाना चाहता हूँ
या हूँ अक्स किसी का और अब खुद शख्सियत बन जाना चाहता हूँ

शायद एक कोरा कागज़ हूँ, किसी का पैगाम बन जाना चाहता हूँ
या हूँ बीती हुई रात और एक नयी सहर बन जाना चाहता हूँ

शायद ढेरो अनकही बातें हूँ, जुबान बन जाना चाहता हूँ
या हूँ पैरों की ज़मीन और आसमान बन जाना चाहता हूँ

शायद सिसकती आवाज़ हूँ, ख़ुशी की चहक बन जाना चाहता हूँ
या हूँ टूटा हुआ साज़ और मोसिकी बन जाना चाहता हूँ

शायद कडवी यादों का सबब हूँ, मीठे लम्हों का एहसास बन जाना चाहता हूँ
या हूँ आँखों से टपकता पानी और ओस की बूँद बन जाना चाहता हूँ

मैं क्या हूँ और न जाने क्या बन जाना चाहता हूँ