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Thursday, December 30, 2010

जिंदगी से पहचान अभी बाकी है

इरादों की मजबूत नींव रखी है यहाँ, खवाबो के मकान अभी बाकी है
जो छूट गया पीछे वो मुकद्दर था, हौसलों से आजमाइश अभी बाकी है

२ कदम चलना भी क्या चलना है, गगन में ऊँची उड़ान अभी बाकी है
आँखों से बहते आंसू थम गए तो क्या, चेहरे की मुस्कान अभी बाकी है

चंद फूलों को तुम बगिया ना कहो, इस दर पर बसंत का आना अभी बाकी है
ये रात तो बस ख़तम होने को है, सूर्य की रश्मियों को झिलमिलाना अभी बाकी है

जो टूट कर बिखरे वो कांच के रिश्ते थे, उस हमकदम से मुलाकात अभी बाकी है
ग़म के ये २ पल भूल जाने के लिए है, जश्न की हर हसीं रात अभी बाकी है

कल को याद कर आज भूलना फिजूल है, इस सफ़र में मक़ाम अभी बाकी है
जो गुजरा वो बस एक तजुर्बा भर था, जिंदगी से पहचान अभी बाकी है

Saturday, October 09, 2010

इस तब्दीलियों के जहाँ में मेरे लिए ये एहसास ही बहुत ख़ास है

ये कैसी तलाश है जो अंजाम तक नहीं पहुचती है 
मुझसे होती है शुरू और ख़त्म भी मुझ पर होती है

ये देखो रेत के वो किले जो रोज़ बनते-बिगड़ते हैं
इनमे छुपे हैं कुछ अरमान जो कभी नहीं मरते हैं

जिंदगी की बिसात पर किस्मत अपनी चाल चलती है
शह और मात की ये दास्तान बरसो अनवरत चलती है

मैं परेशान नहीं मगर हैरान हूँ इंसानों के इस अजीब फलसफे से
किसी के व्यक्तित्व की पहचान है सिर्फ कामयाबी-नाकामयाबी से

अपने अस्तित्व के दो हिस्सों से आजकल रूबरू हो रहा हूँ
कभी वर्तमान में तो कभी अतीत की यादों में जी रहा हूँ 

वक़्त के सैलाब तले अपना यकीन जो खो दे कोई
बाकी क्या रहें जब वजूद की बुनियाद खो दे कोई

आज तुम नहीं हो मगर तुम्हारी मौजूदगी का मुझे आभास है
इस तब्दीलियों के जहाँ में मेरे लिए ये एहसास ही बहुत ख़ास है


Saturday, September 11, 2010

दर्द चेहरे पर नहीं मगर दिल में रहा होगा

बादलों में कहीं चाँद धीमे धीमे छुप रहा होगा
समंदर भी लहरें समेटे बेसुध चुप रहा होगा
उसके चले जाने का एहसास भी ना हुआ मुझे
मेरी पलकों में कोई ख्वाब शायद बस रहा होगा

कांपते होठों पर कोई अल्फाज़ दबा रहा होगा
मन के दरिया के बीच जरुर कोई भंवर रहा होगा
इस तरह ख़ामोशी से बैठना शगल नहीं मेरा
वो मंजर ही शायद कुछ अजीब रहा होगा

सुलगते हुए शोलों पर पानी बरस रहा होगा
कहीं कोने में एक अरमान सिसक रहा होगा
भूलने की कोशिश में यूँ उलझ गएहैं यादों के बीच
दर्द चेहरे पर नहीं मगर दिल में रहा होगा

उसका कोई ख्वाब भी उससे दूर रहा होगा
एकाकी उसका मन बहुत मजबूर रहा होगा
हकीकत और फ़साने में फर्क नहीं समझता मैं
उसके दिल में मेरा ख्याल मगर जरूर रहा होगा

Friday, August 20, 2010

तुम्हारे साथ मैं क्या था, तुम्हारे बगैर क्या बन चुका हूँ ....













तुम उस मोड़ पर इस कदर ठहरी हो, मैं इस किनारे पर उस कदर रुका हूँ
भविष्य की ओर झाँकने का बहाना कर वर्तमान में अतीत बन चुका हूँ

तुम अगर सेहरा में मुरझाया हुआ कोई शुष्क सुमन हो चुकी हो, 
मैं पथरीले रास्तों के किनारों का सूखा हुआ एक ठूंठ बन चुका हूँ 

तुमने भी शायद फिर से अपने पंखों को हवा में यूँ फैलाया नहीं 
मैं भी उन बेशकीमती सैकरो यादों का कैदी बन चुका हूँ 

वो क्या है जो तुम्हे अक्सर अपने आवेग में बहा ले जाता है 
देख इधर मैं भी अपनी तनहाइयों का मुरीद बन चुका हूँ

बेचैन रातों से तुमने दोस्ताना ना जाने कब से कर लिया  
यहाँ अपने ही ख्वाबों के लिए मैं अजनबी बन चुका हूँ

ना जाने किस जिद में फासले यूँ बढ़ गए हैं हमारे दरमियाँ
तुम्हारे साथ मैं क्या था, तुम्हारे बगैर क्या बन चुका हूँ 

Sunday, July 11, 2010

जाने क्यूँ हम अंधेरो की मौजूदगी से इनकार करते हैं ....

अपने ही कदमों के निशानों को रास्तों पर तलाश करते हैं
जाने क्यूँ हम बीते हुए कल में जीने का प्रयास करते हैं

हम खुशियों में भी ढूंढते हैं ग़मगीन होने के हज़ार बहाने
जाने क्यूँ दूसरों की नाकामयाबी का बेसब्री से इंतज़ार करते हैं

जब खुद के ख्वाबो पर हमें ही नहीं ऐतबार जरा सा भी
जाने क्यूँ किस्मत की लकीरों की बात बार-२ किया करते हैं

किसी के अरमानो को पैरों तले बेदर्दी से कुचल डालते हैं हम
जाने क्यूँ उसे अपने आप से इस कदर बेजार करते हैं

जलती बुझती रोशनियों को जिंदगी की हकीकत मानते हैं
जाने क्यूँ हम अंधेरो की मौजूदगी से इनकार करते हैं

कुछ पल की ख़ुशी के लिए हजारों आंसू उधार ले लेते हैं
जाने क्यूँ हम खुदा को भूल जाने का गुनाह करते हैं

Friday, June 18, 2010

मेरे लिए हजारों वजहों का होना भी काफी नहीं था ...













बेरुखी के आलम में उम्मीदों का लिबास था
मैं तेरा ख्याल नहीं, इस का मुझे आभास था
अनगिनत कही उन बातों का कोई मतलब नहीं था
इस हकीकत को झुठला पाने में मगर मैं नाकाम था

उसकी ख्वाहिशों से शायद मैं वाकिफ नहीं था
मगर अपने सुन्दर ख्वाब तोड़ देना मुनासिब नहीं था
तुमने खफा होने के लिए ढूंढ़ लिया था एक बहाना
मेरे लिए हजारों वजहों का होना भी काफी नहीं था

तुमने मुझे समझा नहीं, न मैं तुम्हे जान पाया
न जाने क्या था वो जो मुझे तुम्हारे करीब लाया
तुमने मुझे कभी उन निगाहों से ना देखा हो
मैंने सदा समझा है तुम्हे अपना हमसाया

अब मैं इन गलियों में तनहा ही सफ़र किया करता हूँ
दोस्तों से हंसकर कभी कभी मिल भी लिया करता हूँ
ये ना सोचना कि मिट चुका है तुम्हारा अस्तित्व मेरे जेहन से
तुम्हारे खयालो के सहारे ही हँसते हुए जी लिया करता हूँ

Sunday, April 04, 2010

कहीं न कहीं तो जरुर मिलेगा मेरी तिशनगी को सुकून



















कुछ अनचाहे तुफानो ने मेरी कश्ती को घेरा हुआ है
न जाने क्यूँ हर पल जिंदगी का इस कदर ठहरा हुआ है

मुट्ठी में आते आते क्यूँ फिसल जाती है कामयाबी
आसान से सवालों में क्यूँ उलझ जाती है जिंदगी

अपने अतीत की सुनहरी यादों से मैं घबराने लगा हूँ
नाकामियों की झुलसती धुप में मुरझाने लगा हूँ

आँखों से बहने से अब आंसू भी कतराने लगे हैं
होश में हूँ मगर कदम फिर भी लड़खड़ाने लगे हैं

क्या थे मेरे जज़्बात और क्या मेरी हस्ती थी
बिखरने से पहले यहाँ मेरे अरमानो की बस्ती थी

न जाने कब तक मुझे तपते रेगिस्तान में चलते जाना है
किस्मत के अजीब खेल को यहाँ आखिर किसने जाना है

मगर मुझमे भी है लड़ते रहने का जज्बा और जूनून
कहीं न कहीं तो जरुर मिलेगा मेरी तिशनगी को सुकून

Monday, March 15, 2010

एक शहीद के नाम उसकी बीवी की पाती


















इस कविता से पहले ये कुछ पंक्तियाँ लिखनी जरुरी थी क्यूंकि शीर्षक से जैसा आभास होता है, कविता वैसी नहीं है | ये कहना आसान है कि एक शहीद की पत्नी होने पे गर्व की अनुभूति होनी चाहिए |  मगर यथार्थ में उस औरत पे क्या बीतती है, जो पहले तो महीनो-महीनो अपने पति से दूर रहती है और फिर एक दिन सदा के लिए उसका साथ गँवा देती है, हम नहीं जानते | ये ऐसी ही एक शहीद की विधवा की व्यथा कहने का मेरा प्रयास है |  

अब मुझे हर पल याद नहीं आती है तुम्हारी
आंसुओ से नहीं भीगती है आजकल मेरी साड़ी |

अब मैं तुम्हारा इंतज़ार नहीं किया करती हूँ
पलकें मीचे सारी रात नहीं जगा करती हूँ  |

अब भुला चुकी हूँ मैं तुम्हारे सख्त हाथों का स्पर्श
अब नहीं उठती निगाहें तुम्हारी तस्वीर की ओर बरबस |

अब मुझे रातों को मीठे-मीठे ख्वाब नहीं आते हैं
अब सारे आंसू पलकों की कैद में ही सूख जाते हैं |

अब तनहाइयाँ मेरा कोई भी इम्तिहान नहीं लेती हैं
अब सूनी कलाई कुछ न होने का आभास नहीं देती हैं  |

अब नहीं है मुझे तुमसे कोई भी गिला शिकवा
अब मैं नहीं मांगती हूँ उपरवाले से कोई दुआ |

अब मुझे कुरेदता नहीं है तुम्हारा वादों को तोड़ देना
अब मैंने छोड़ दिया है हकीकत से मुंह मोड़ लेना |

अब मुझे हर पल याद नहीं आती है तुम्हारी
आंसुओ से नहीं भीगती है आजकल मेरी साड़ी |




                                                         

Saturday, March 06, 2010

Wednesday, March 03, 2010

मैं क्या हूँ और न जाने क्या बन जाना चाहता हूँ .......


















मैं क्या हूँ और न जाने क्या बन जाना चाहता हूँ

शायद किसी की तलाश हूँ, मंजिल बन जाना चाहता हूँ
या हूँ सेहरा की धुप और बादल बन जाना चाहता हूँ

शायद अजनबी हूँ किसी के लिए, दोस्त बन जाना चाहता हूँ
या हूँ एक ठहरा हुआ दरख़्त और बहती पवन बन जाना चाहता हूँ

शायद कोई भूली हुई कहानी हूँ, हकीकत बन जाना चाहता हूँ
या हूँ अक्स किसी का और अब खुद शख्सियत बन जाना चाहता हूँ

शायद एक कोरा कागज़ हूँ, किसी का पैगाम बन जाना चाहता हूँ
या हूँ बीती हुई रात और एक नयी सहर बन जाना चाहता हूँ

शायद ढेरो अनकही बातें हूँ, जुबान बन जाना चाहता हूँ
या हूँ पैरों की ज़मीन और आसमान बन जाना चाहता हूँ

शायद सिसकती आवाज़ हूँ, ख़ुशी की चहक बन जाना चाहता हूँ
या हूँ टूटा हुआ साज़ और मोसिकी बन जाना चाहता हूँ

शायद कडवी यादों का सबब हूँ, मीठे लम्हों का एहसास बन जाना चाहता हूँ
या हूँ आँखों से टपकता पानी और ओस की बूँद बन जाना चाहता हूँ

मैं क्या हूँ और न जाने क्या बन जाना चाहता हूँ

Saturday, February 13, 2010

शायद अफसाना पहले प्यार का कुछ इसी तरह बयां होता है


















जब तुमने मेरे चेहरे को अपने हाथों से छुआ था
मेरे मन के तारों में एक स्वर प्रस्फुटित हुआ था

मुस्कुराकर जब तुमने अपनी पलकों को झुकाया था
क्या कहता तुमसे, तब मैं खुद भी शरमाया था

अनगिनत बातें तुम्हारी सारी-सारी रात मैंने सुनी थी
छत के एक कोने में बैठ कई रूमानी गज़लें बुनी थी

तुम्हारी ख्वाहिशों के इर्द-गिर्द ही मैंने अपने सारे ख्वाब रचे थे
जब-जब बदले तुम्हारे अरमान, मेरे सपने भी साथ-साथ बदले थे

तुम पूछा करती थी, क्यूँ आजकल मैं अनायास ही मुस्कुरा देता हूँ
न जाने किस के ख्यालों में रास्तो पर बेहिसाब ठोकरें खा लेता हूँ

कैसे कहता तुमसे की मेरे खुशनुमा सुबहो का सबब तुम ही तो हो
किसी समंदर सी शांत मेरी शामों की चहक तुम ही तो हो

मोहब्बत की कोई परिभाषा नहीं होती, वो पत्तो पर फिसलती ओस की तरह होती है
जीने के लिए शायद जरुरी ना हो, मगर ज़िन्दगी उस बिन खूबसूरत नहीं होती है

आज भी वो हसीं लम्हे मेरी आँखों में चमक ले आते हैं
सावन की टपकी पहली बूँद सा सुकून दे जाते हैं

कभी हँसता कभी रोता हुआ यादों का वो कारवां होता है
शायद अफसाना पहले प्यार का कुछ इसी तरह बयां होता है

Monday, February 01, 2010

तेरे सर का बादल बन जाने का ख्वाब था














है नहीं कोई खूबसूरत वजह कि अपने गुनाहों को छुपा सकूँ
लबों पे मुस्कराहट लाऊ और पलकों में आंसू छुपा सकूँ |

मैं तो मंजर में ही गुम हो गया यूँ, काफिला चलता रहा मंजिल की ओर
अब तो बस तन्हाई है सफ़र में, मंजिल का न कोई ओर न छोर |

किसी का आइना बन जाना मंजूर न था, खुद का अक्स भी तलाश न पाए
तेरे सर का बादल बन जाने का ख्वाब  था, रास्ते का दरख़्त तक बन न पाए |

अब तो खामोशियाँ भी कर गयी किनारा, हवाएं  भी मुझे सहलाती नहीं है
लहरों से मेरा दोस्ताना कब था, वो भी दिल को मगर दहलाती नहीं है |

इतनी सी गुजारिश है अब वक़्त से मेरी, दो नए पल जिंदगी के पा तो सकूँ
चाहे न दे खुशियों के साज़ नए, यादों के कुछ नगमे गुनगुना तो सकूँ |

Sunday, January 24, 2010

कुछ खामोशियों में तुम्हे सुनता हूँ......

















तुम यहाँ नहीं हो मगर तुम्हारी मौजूदगी का मुझे एहसास है
नज़र नहीं आते तो क्या, मुझे तुम्हारे वजूद पर विश्वास है

रेत पर लेटकर आसमा से मैं आज भी बातें किया करता हूँ
सितारों की महफ़िल में ही कहीं तुम्हारी झलक देखा करता हूँ

उगते सूरज की किरणों में भी मुझे तुम्हारी छवि नज़र आती है
मेरी हर सुबह को वो रौशनी से सराबोर कर जाती है

तनहाइयों में रहकर भी मैं कभी तनहा नहीं होता हूँ
कुछ कहता हूँ खुद ,कुछ खामोशियों में तुम्हे सुनता हूँ

यूँ तो मुस्कुराने को मैंने अपनी आदत बना लिया है
तुम्हारी यादों को अस्तित्व का मेरे हिस्सा बना लिया है

फिर भी कभी अचानक ही आँखें पानी छलका देती हैं
ज़िन्दगी की कडवी हकीकत से रूबरू करवा देती हैं

मगर मुझे खोना नहीं है ,बिखर नहीं जाना है
तुम्हे जिन्दा रखने की खातिर मुझे भी जीते जाना है