rss
email
twitter
facebook

Monday, April 04, 2011

वक़्त को तुम्हारी एक नयी दास्तान लिखने दो जरा...












अश्कों की लड़ियों को ज़मीन पे गिरने दो जरा 
इस पानी को और न रोको इसे बहने दो जरा 
एक नयी सुबह तेरे इंतज़ार में बाहें फैलाये है 
इस लम्बी काली रात को अब जाने दो जरा 

ख्वाब कभी मरते नहीं, खो जरुर जाते हैं 
इन थकी आँखों को उनका पता ढूंढने दो जरा 
फूलों को तो हमेशा खिलना है कुछ पल मुरझाकर 
इस आबोहवा को खुशबु से फिर महकने दो जरा 

किसे छूटना था पीछे, ये किस्मत का फैसला था 
 अतीत की परछाइयों से मन को निकलने दो जरा
अब नयी मंजिल की ओर जाती एक नयी राह है 
वक़्त को तुम्हारी एक नयी दास्तान लिखने दो जरा

Sunday, March 27, 2011

वक़्त भी यारो कभी करवट बदलता तो होगा

पतझर में भी कहीं फूल खिलता तो होगा 
सेहरा में भी कोई दरख़्त मिलता तो होगा

जिंदगी की राह पर खुद को अकेला न समझ 
तेरा साया तो हर कदम तेरे साथ चलता होगा 

तूफ़ान में चाहे सारा शहर अँधेरे में गुम हो जाए
किसी घर के कोने में एक दिया तो जलता होगा 

आज हम बिछड़े हैं, कल शायद फिर मिल जाएँ
वक़्त भी यारो कभी करवट बदलता तो होगा

Thursday, December 30, 2010

जिंदगी से पहचान अभी बाकी है

इरादों की मजबूत नींव रखी है यहाँ, खवाबो के मकान अभी बाकी है
जो छूट गया पीछे वो मुकद्दर था, हौसलों से आजमाइश अभी बाकी है

२ कदम चलना भी क्या चलना है, गगन में ऊँची उड़ान अभी बाकी है
आँखों से बहते आंसू थम गए तो क्या, चेहरे की मुस्कान अभी बाकी है

चंद फूलों को तुम बगिया ना कहो, इस दर पर बसंत का आना अभी बाकी है
ये रात तो बस ख़तम होने को है, सूर्य की रश्मियों को झिलमिलाना अभी बाकी है

जो टूट कर बिखरे वो कांच के रिश्ते थे, उस हमकदम से मुलाकात अभी बाकी है
ग़म के ये २ पल भूल जाने के लिए है, जश्न की हर हसीं रात अभी बाकी है

कल को याद कर आज भूलना फिजूल है, इस सफ़र में मक़ाम अभी बाकी है
जो गुजरा वो बस एक तजुर्बा भर था, जिंदगी से पहचान अभी बाकी है

Saturday, October 09, 2010

इस तब्दीलियों के जहाँ में मेरे लिए ये एहसास ही बहुत ख़ास है

ये कैसी तलाश है जो अंजाम तक नहीं पहुचती है 
मुझसे होती है शुरू और ख़त्म भी मुझ पर होती है

ये देखो रेत के वो किले जो रोज़ बनते-बिगड़ते हैं
इनमे छुपे हैं कुछ अरमान जो कभी नहीं मरते हैं

जिंदगी की बिसात पर किस्मत अपनी चाल चलती है
शह और मात की ये दास्तान बरसो अनवरत चलती है

मैं परेशान नहीं मगर हैरान हूँ इंसानों के इस अजीब फलसफे से
किसी के व्यक्तित्व की पहचान है सिर्फ कामयाबी-नाकामयाबी से

अपने अस्तित्व के दो हिस्सों से आजकल रूबरू हो रहा हूँ
कभी वर्तमान में तो कभी अतीत की यादों में जी रहा हूँ 

वक़्त के सैलाब तले अपना यकीन जो खो दे कोई
बाकी क्या रहें जब वजूद की बुनियाद खो दे कोई

आज तुम नहीं हो मगर तुम्हारी मौजूदगी का मुझे आभास है
इस तब्दीलियों के जहाँ में मेरे लिए ये एहसास ही बहुत ख़ास है


Saturday, September 11, 2010

दर्द चेहरे पर नहीं मगर दिल में रहा होगा

बादलों में कहीं चाँद धीमे धीमे छुप रहा होगा
समंदर भी लहरें समेटे बेसुध चुप रहा होगा
उसके चले जाने का एहसास भी ना हुआ मुझे
मेरी पलकों में कोई ख्वाब शायद बस रहा होगा

कांपते होठों पर कोई अल्फाज़ दबा रहा होगा
मन के दरिया के बीच जरुर कोई भंवर रहा होगा
इस तरह ख़ामोशी से बैठना शगल नहीं मेरा
वो मंजर ही शायद कुछ अजीब रहा होगा

सुलगते हुए शोलों पर पानी बरस रहा होगा
कहीं कोने में एक अरमान सिसक रहा होगा
भूलने की कोशिश में यूँ उलझ गएहैं यादों के बीच
दर्द चेहरे पर नहीं मगर दिल में रहा होगा

उसका कोई ख्वाब भी उससे दूर रहा होगा
एकाकी उसका मन बहुत मजबूर रहा होगा
हकीकत और फ़साने में फर्क नहीं समझता मैं
उसके दिल में मेरा ख्याल मगर जरूर रहा होगा

Friday, August 20, 2010

तुम्हारे साथ मैं क्या था, तुम्हारे बगैर क्या बन चुका हूँ ....













तुम उस मोड़ पर इस कदर ठहरी हो, मैं इस किनारे पर उस कदर रुका हूँ
भविष्य की ओर झाँकने का बहाना कर वर्तमान में अतीत बन चुका हूँ

तुम अगर सेहरा में मुरझाया हुआ कोई शुष्क सुमन हो चुकी हो, 
मैं पथरीले रास्तों के किनारों का सूखा हुआ एक ठूंठ बन चुका हूँ 

तुमने भी शायद फिर से अपने पंखों को हवा में यूँ फैलाया नहीं 
मैं भी उन बेशकीमती सैकरो यादों का कैदी बन चुका हूँ 

वो क्या है जो तुम्हे अक्सर अपने आवेग में बहा ले जाता है 
देख इधर मैं भी अपनी तनहाइयों का मुरीद बन चुका हूँ

बेचैन रातों से तुमने दोस्ताना ना जाने कब से कर लिया  
यहाँ अपने ही ख्वाबों के लिए मैं अजनबी बन चुका हूँ

ना जाने किस जिद में फासले यूँ बढ़ गए हैं हमारे दरमियाँ
तुम्हारे साथ मैं क्या था, तुम्हारे बगैर क्या बन चुका हूँ 

Sunday, July 11, 2010

जाने क्यूँ हम अंधेरो की मौजूदगी से इनकार करते हैं ....

अपने ही कदमों के निशानों को रास्तों पर तलाश करते हैं
जाने क्यूँ हम बीते हुए कल में जीने का प्रयास करते हैं

हम खुशियों में भी ढूंढते हैं ग़मगीन होने के हज़ार बहाने
जाने क्यूँ दूसरों की नाकामयाबी का बेसब्री से इंतज़ार करते हैं

जब खुद के ख्वाबो पर हमें ही नहीं ऐतबार जरा सा भी
जाने क्यूँ किस्मत की लकीरों की बात बार-२ किया करते हैं

किसी के अरमानो को पैरों तले बेदर्दी से कुचल डालते हैं हम
जाने क्यूँ उसे अपने आप से इस कदर बेजार करते हैं

जलती बुझती रोशनियों को जिंदगी की हकीकत मानते हैं
जाने क्यूँ हम अंधेरो की मौजूदगी से इनकार करते हैं

कुछ पल की ख़ुशी के लिए हजारों आंसू उधार ले लेते हैं
जाने क्यूँ हम खुदा को भूल जाने का गुनाह करते हैं